बिहार की नई कैबिनेट के गठन के बाद एक सवाल लगातार उठ रहा है — क्या बिहार की राजनीति में कायस्थ समाज को धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है? नई सरकार में एक भी कायस्थ चेहरे को मंत्री पद नहीं मिलना केवल राजनीतिक चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि उस समाज की पीड़ा भी है जिसने बिहार के निर्माण, प्रशासन, शिक्षा और बौद्धिक विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया है।
यह वही बिहार है जिसकी विधानसभा आज जिस भूमि पर खड़ी है, वह भूमि बिहार निर्माता माने जाने वाले Dr. Sachidanand Sinha द्वारा दान की गई थी। कई ऐतिहासिक लेखों और सामाजिक अभियानों में यह दावा किया गया है कि डॉ. सचिदानंद सिन्हा ने न केवल बिहार को अलग राज्य का स्वरूप दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि विधानसभा के लिए अपनी निजी जमीन भी दान दी थी।
कायस्थ समाज का इतिहास केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। प्रशासन, न्यायपालिका, शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता — हर क्षेत्र में इस समाज ने बिहार को दिशा दी। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक बिहार के निर्माण तक अनेक कायस्थ विभूतियों ने राज्य को पहचान दिलाई। लेकिन आज की राजनीति में उस समाज का प्रतिनिधित्व लगातार घटता दिख रहा है।
नई कैबिनेट में विभिन्न जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश साफ दिखाई देती है। कई नए चेहरे शामिल किए गए, सामाजिक संतुलन की बातें हुईं, लेकिन कायस्थ समाज पूरी तरह अनुपस्थित रहा।
यही कारण है कि सोशल मीडिया से लेकर सामाजिक संगठनों तक इस विषय पर नाराज़गी देखी जा रही है। कई मंचों पर यह सवाल पूछा जा रहा है कि जिस समाज ने बिहार को प्रशासनिक और बौद्धिक नेतृत्व दिया, उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व से क्यों दूर रखा जा रहा है।
इतिहास गवाह है कि बिहार के निर्माण में Dr. Sachidanand Sinha की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्हें बिहार राज्य निर्माण आंदोलन का प्रमुख चेहरा माना जाता है। बिहार की पहचान, उसकी संस्थाओं और उसकी राजनीतिक नींव में उनका योगदान आज भी दर्ज है।
ऐसे में सवाल केवल मंत्री पद का नहीं है, बल्कि सम्मान और भागीदारी का भी है। लोकतंत्र में हर समाज अपनी हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व चाहता है। बिहार की राजनीति यदि वास्तव में “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है, तो उन समाजों को भी उचित स्थान देना होगा जिन्होंने राज्य की बुनियाद मजबूत की।
कायस्थ समाज की यह पीड़ा केवल सत्ता में हिस्सेदारी की मांग नहीं, बल्कि इतिहास को याद रखने की अपील भी है। बिहार की राजनीति बदल सकती है, चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन बिहार के निर्माण में जिन लोगों ने अपना योगदान दिया, उन्हें इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता।
